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दीवारों में दर होता है

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'179
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
दीवारों में दर होता है हर घर में अक्सर होता है
खिड़की रोशनदान की ज़द में
बाहर का मंज़र होता है
गागर भव सागर में जब हो
जल अंदर बाहर होता है
अणु से भिन्न कहाँ परमाणू
दरिया में सागर होता है
छाती पर युक्रेन के हरदम
रसिया का लश्कर होता है
कौन मुखौटे से वंचित है
हर रुख़ पर अस्तर होता है
इतने एप हसीं दिखने के
बद चेहरा बेहतर होता है
कौन 'कंवल' को समझाए अब
मंज़िल हो तो सफ़र होता है