#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'178
दिल बड़ा बेक़रार रहता है
आप का इंतज़ार रहता है
तुम मुझे भीड़ से बुला लोगे
तुम पे यह ऐतबार रहता है
तुम जो सोलह सिंगार करते हो
मेरी आँखों में प्यार रहता है
बे इजाज़त तुम्हारे दर पर हूँ
दिल पे कब इख़्तियार रहता है
एक लम्हे पे अख़्तियार नहीं
इक सदी का क़रार रहता है
घर में रहते थे चैन से पहले
घर में अब इन्तशार रहता है
एक कश्ती को ग़र्क़ करने को
कितनी मौजों का वार रहता है
कैफ़ कोई हो अब तुम्हारे बिना
ग़म की मानिंद यार रहता है
जुर्म उसका नहीं है अब कुछ भी
आदतन वह फ़रार रहता है
अब तो सावन है शाम-ए-रिमझिम है
क्यों ‘कँवल’ अश्कबार रहता है
सृजन : 7 जुलाई 2013
प्रसारण : आकाशवाणी,पटना उर्दू प्रोग्राम
3 सितम्बर 2018
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