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दिल का मौसम ,तेरी गलियां,दिन सुहाने सोचकर

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'175
दिल का मौसम ,तेरी गलियां,दिन सुहाने सोचकर
हम बहुत हैरां हुए,क़िस्से पुराने सोचकर
ग़म के दस्तरख़्वान,प्याले दर्द के, लब पर हंसी
रतजगा में ख़ुश हूँ दिल के ताने बाने सोचकर
बंद थी मुट्ठी,हथेली पर किसी का नाम था
वो परेशां था बहाने पर बहाने सोचकर
झील पोखर में खिलें लेकिन समुन्दर में नहीं
मैं हूँ हैरत में कमल के आशियाने सोचकर
ऊब जाए मन किसी से और किसी से न भरे
कुछ भी कह पाऊं नहीं दिल के बहाने सोचकर
मोगरा के फूल उजले राह में बिछ जायेंगे
चल पड़ी माह-ए-लक़ा टब में नहाने सोचकर
मिलते हैं सब अपने अपने काम की ख़ातिर ‘कँवल’
मैं बदल पाया नहीं अपने ठिकाने सोचकर
सृजन 28 फ़रवरी 2018
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