#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'177
दिल की बस्ती में लूट पाट न कर
मेरी दुनिया को यूँ उचाट न कर
मुफ़लिसी है मगन घरौंदों में
उनके बर्बाद ठाट बाट न कर
दे के ख़ुश रहते हैं फ़क़ीर हैं ये
पेश तू उनको राज पाट न कर
हो न मग़रूर तेरा कुछ भी नहीं
धूप में शबनमी ललाट न कर
शाहराहों पे गाड़ी चलने दे
उनको बाज़ार मछली हाट न कर
बेच गांधी को मत इलेक्शन में
राजनीति तू राजघाट न कर
ये ज़रूरी है कम ज़रूरत हो
ख्वाहिशों को ‘कँवल’ विराट न कर
सृजन : 31 अक्टूबर, 2015
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