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दिन से डर कैसा हसीं रात से जी डरता है

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'173
दिन से डर कैसा हसीं रात से जी डरता है
ज़िन्दगी तेरे तिलिस्मात से जी डरता है
किसलिए,कौन,कहाँ,किसने,क्यों बर्बाद किया
छोड़िये ऐसे सवालात से जी डरता है
दोस्ती,प्यार,वफ़ा,उनके इनायात करम
रोज़ छलते हुए जज़्बात से जी डरता है
दबदबा,नाम,पहुँच,ओहदे थे सब मेरे वरक़
आज पर उन सभी सफ़हात से जी डरता है
कब बिछड़ जायेंगे, कब देंगे दग़ा क्या मालूम
गुनगुनाते हुए लम्हात से जी डरता है
सेक्युलर लोगों को आता है क़यादत का हुनर
मत ग़लत कहिये कि गुजरात से जी डरता है
जिन ख्यालों में रहा करता था मैं मस्त ‘कँवल’
इन दिनों वैसे ख़यालात से जी डरता है
सृजन 1 मई 2016
इन्कलाब उर्दू पटना में 11 मई 2016 को प्रकाशित
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