#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'170
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
दस्ते- क़ातिल बेहुनर है आजकल
मुफ़्लिसों के तन पे सर है आजकल
मुंसिफ़ों को है समाअत से गुरेज़
फ़ैसला सब बेअसर है आजकल
अब नहीं होता कहीं दंगा फ़साद
वाक़ई शासन का डर है आजकल
जबसे चौकीदार है बदला गया
अम्न की मस्ती में घर है आजकल
अब किसी को दे नहीं कोई पनाह
ताक में कोई शरर है आजकल
हम फ़क़ीरों का है बस वो आसरा
उसकी रहमत पर नज़र है आजकल
आजकल हम से जुदा हैं वो 'कँवल'
सूनी - सूनी रहगुज़र है आजकल