#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'167
फ़ाइलातुन फ़ाइलालुन फ़ाइलुन
इश्क़ का आँगन इधर गुलज़ार है
दर्द का लश्कर उधर तैयार है
हर तरफ़ जब लूट का बाज़ार है
होश में रहिये यही दरकार है
पत्थरों की ज़द में आता ही नहीं
आजकल का आइना हुशियार है
एक मिसरा क्या ज़ुरूरत का पढ़ा
सामने एहसान का अख़बार है
क़ाफ़ियों मिसरों की जब तज़ईन हो श्रृंगार साज-सज्जा
फिर तग़ज्ज़ुल ज़ीनते- अशआर है शे'र की शोभा
आलमे-मस्ती का मौसम देखकर
झूमता गाता मेरा दिलदार है
मन मुताबिक़ एप डाउनलोड हैं
हुबहू दिखता कहाँ किरदार है
फूल से ख़ुशबू जुदा करने की ज़िद
रायगाँ है, कोशिशे - बेकार है
ख़ूबसूरत है यक़ीनन ज़िन्दगी
हाँ ! ‘कँवल’ को ज़िन्दगी से प्यार है
सृजन : 24 अक्टूबर, 2020
अभिनव प्रयास,अलीगढ़ जनवरी-मार्च 2021 अंक में पृष्ठ 17 पर प्रकाशित