#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'169
फ़ायलातुन फ़ायलुन
दर्द की भाषा पढ़ो
भावनाओं में बहो
कुछ सुनाएं अपनी हम
तुम भी कुछ अपनी कहो
बाहों के हैं दायरे
आओ इनमें खुश रहो
अपनी पेशानी पे अब
इक शिकन पड़ने न दो
शबनमी मलबूस है
दूर सूरज से रहो
नफ़रतों के शहर में
प्रेम की खुशबू भरो
लम्स के अल्फ़ाज़ से
ओस पर ग़ज़लें कहो
कैसी है जम्हूरियत
आईने से पूछ लो
है ज़मीं बंजर 'कँवल'