#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'168
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
दर्द की धुन पर ग़ज़ल है
सुरमई आँखों में जल है
गुमशुदा लमहों का पल है
भावना व्यापक प्रबल है
दिल मेरा व्याकुल है कितना
यह जुदाई का अनल है
भंग करने को तपस्या
मेनका अब तक विकल है
एक विश्वामित्र जैसा
कल्प है तो इंद्र छल है
इत्र के वातावरण में
मित्र अनुकम्पा सबल है
कल्पना नीतीश जी की
देखिये हर घर में नल है
ख़ुद को जब सौंपा तो जाना
साधना कितनी सफल है
मैं उसे पढता हूँ पहरों
वो मेरे दिल का 'कँवल' है