#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'159
तुम ही कहो बढ़ जाती है क्यों बरसातों में दिल की जलन
ढंड़ी फुहारों से लगती है, तन मन में क्यों और अगन
तुम क्या जानो बरसे हैं जब आवारा बादल 'सावन’
बढ़ जाती है कितनी तुम से मिलने की तड़पन तरसन
भीग रही है कोई कुंवारी छत पर इन बौछारों में
कोई दिवाना प्रीतम के दरशन में है यूं आज मगन
आह मचलने लगते हैं अरमान दिले-आवारा में
आता है जब याद तेरा भीगा भीगा श्फ़्फ़ाफ़ बदन
तुम हो कहां महबूब मेरे सावन की नशीली रातों में