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तुम हमारे न हुए,कोई हमारा न हुआ

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'156
तुम हमारे न हुए,कोई हमारा न हुआ
बह्रे-हस्ती में कोई दिल का सहारा न हुआ
सनसनाता है तेरे नाम से हर ज़ख्म मेरा
पर तुझे याद करूँ जग को गवारा न हुआ
ग़ैर का शहर, किसी ग़ैर का घर आँगन था
ख़्वाब अपना था मगर सेज हमारा न हुआ
देर तक ख़ुशबू बिखेरे,जले तिल तिल के,बुझे
धूप बत्ती की तरह कोई सितारा न हुआ
शाख़ से टूट के काँधे पे हवाओं के उड़ा
न मिली मिट्टी,ये गुलशन भी हमारा न हुआ
बरहना तन ने तो पहने कई ख़ुशरंग क़बा
पर कफ़न जैसा तो मलबूस-ए-दिलआरा न हुआ
मैंने सदियों की ख़ुशी मांगी दुआओं में ‘कँवल’
एक लम्हे का मसर्रत भी ख़ुदारा न हुआ
सृजन 24 अक्टूबर 2015
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