#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'155
तुमसे मैं मुझसे आशना तुम हो
मैं हूँ ख़ुशबू मगर हवा तुम हो
मैं लिखावट तुम्हारे हाथों की
मेरी तक़दीर का लिखा तुम हो
तुम अगर सच हो, मैं भी झूठ नहीं
अक्स मैं, मेरा आइना तुम हो
बेख़ुदी ने मेरा भरम तोड़ा
मैं समझता रहा ख़ुद तुम हो
मैं हूँ मुजरिम, मेरे हो मुंसिफ़ तुम
मैं ख़ता हूँ, मेरी सज़ा तुम हो
सीप की आस बनके चाहूँ तुम्हें
लाये जो मोती वह घटा तुम हो
अपनी मजबूरियों का रंज नहीं
बेवफ़ा मैं हूँ , बावफ़ा तुम हो
रोग बनकर पड़ा हुआ है 'कँवल'