#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'151
तब्लीग़ी जमाती भला जाहिल नहीं होंगे
क्या लोग ये इंसान के क़ातिल नहीं होंगे
मस्जिद से अज़ाँ देंगे पुकारेंगे ख़ुदा को
लेकिन ये वतन के लिए हामिल नहीं होंगे श्रमिक
अपनाएंगे हरगिज़ न जो महफ़ूज़ है दूरी
फैलायेंगे अफ़वाह ये कामिल नहीं होंगे
थूकेंगे हकीमों पे चलाएंगे ये पत्थर
तो क्यों भला हालात ये मुश्किल नहीं होंगे
ये छींटाकसी नर्सों पे नंगे हो करें जब
क्या दीप ये तहज़ीब के ज़ाइल नहीं होंगे संस्कृति / नष्ट
छुप जायें, इलाज और दवा को भी न निकलें
अहमक़ हैं गुनहगार ये आदिल नहीं होंगे नासमझ /न्यायनिष्ठ
इस्लाम के पैग़ाम से वाक़िफ़ ही नहीं ये
क्या आप ‘कँवल’ ऐसे में बिस्मिल नहीं होंगे