#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'149
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ैलुन
तन की हसरत में अब उबाल नहीं
मन को इसका कोई ख़याल नहीं
अब नयन मस्तियों के ताल नहीं
सुर्ख होते हैं उनके गाल नहीं
पास रह कर भी दूर हैं मुझसे
पहले होता था ऐसा हाल नहीं
अश्क आँखों में अब नहीं आते
अब लबों पर कोई सवाल नहीं
अब हवेली है दिल की अफ़सुर्दा
इसमें होता कोई वबाल नहीं
ख़्वाहिशों की दुल्हन हुई बेवा
इसकी सज- धज पे है ज़वाल नहीं
जो भी अच्छा लगे तू फ़ौरन कर
आज की बात कल पे टाल नहीं
जान लेने पे हैं तुले सारे
किसी मज़हब को अब मलाल नहीं
है तबो- ताब अब भी सज- धज में
अब भी उनकी 'कँवल' मिसाल नहीं
16 जनवरी,2022