#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'146
डट के पीछे मेरे पड़ा है कोई
और आगे तना खड़ा है कोई
मुन्तशर है दिमाग़ का दफ़्तर
दिल-ए-नादान से लड़ा है कोई
सब की हस्ती है,बेमिसाल हैं सब
कोई छोटा,न ही बड़ा है कोई
चुभता रहता हूँ सबकी आँखों में
जब से इस आँख में गड़ा है कोई
काँप उठता है हर घड़ी दो घड़ी
वक़्त के खौफ़ का घड़ा है कोई
किसी नायाब हीरे-मोती सा
मेरी दस्तार में जड़ा है कोई
बेच डालूं ज़मीर मैं भी ‘कँवल’
बस इसी बात पर अड़ा है कोई
सृजन : 24 अक्टूबर,2015
आकाशवाणी पटना के उर्दू कार्यक्रम में 16 मई,2016 को प्रसारित
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