#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'134
झूमती हर सुबह की खूं में नहाई शाम है
फिर भी सर पर सुबह के ही क़त्ल का इल्जाम है
क्या हुआ गलियों में मेरा इश्क़ जो बदनाम है दर हक़ीक़त1 इश्क़ रूस्वाई 2 का ही इक नाम है
फिर सदा3 दी है मेरे माज़ी4 ने मुझको दफ़्अतन5
फिर मेरी सांसो में बरपा6 हश्र 7 का कोहराम है
लहर इक मिटते ही आ जाता है लहरों का हजूम
जिंदगी शायद किसी तूफ़ाने-ग़म का नाम है
फिर रहा हूं दर बदर ज़ख़्मों की चादर ओढ़कर
ये मेरे माहौल ने बख्शा मुझे इन आम है
कितने अश्कों के दिये हम ने जलाये ऐ 'कंवल’ उस हंसी के वास्ते जो आज तक गुमनाम है