#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'128
जुर्म है इश्क़ तो हां इसका खतावार हूं मैं
जुर्रते-दिल 1 न पशेमां 2 हो कि खुद्दार3 हूं मैं .
कोई तस्वीर नहीं, कोई तसव्वुर भी नहीं
दरे - एहसास4 पे लम्हाते - गिरांबार5 हूं मैं
जख्म ही ज़ख़्म मुझे गर्दिशे-दौरां6 ने दिये
एक मुíत से मसर्रत7 का तलबगार8 हूं मैं
दिल के कशकोल9 में जुज़10 अश्के-अलम 11 कुछ भी नहीं
फिर भी दुनिया ये समझती है कि ज़रदार12 हूं मैं
दस्ते-साकी13 से कभी जाम लिया था बढ़कर
जुर्म में इसके शहीदे-रसनो-दार14 हूं मैं
हूरो-गि़ल्मां15 से न वाकिफ16 न ही अफ़्लाकनशीं17 नौ-ए-इन्सां 18 की परसतिश19 का गुनहगार हूं मैं
सख्त पहरा है रिवाजों का मसर्रत20 पे 'कंवल’ रविशे-दहर21 से इस वास्ते बेज़ार22 हूं मैं