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जुर्म का इक़रार कर लूँ मुझको हिम्मत हो गयी

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'127
जुर्म का इक़रार कर लूँ मुझको हिम्मत हो गयी
सच कहूँगा आप से मुझको मुहब्बत हो गयी
आरिज़–ओ- लब ज़ुल्फ़ का स्पर्श तक करने लगे
अब सफ़ीरे-शहरे-दिल की इतनी जुर्रत हो गयी
हम तुम्हारे हो गए,तुम भी हमारे हो गए
एक पल में इक सदी क्या ख़ूबसूरत हो गयी
मैं ग़ज़ल के फूल उसको पेश कर मदमस्त था
वह हुआ मख़मूर,उसकी भी इनायत हो गयी
लग गईं पाबंदियां बाहर निकलने पर बहुत
जब किसी दोशीज़ा को मुझ से मुहब्बत हो गयी
कर सके कुछ भी कहाँ,’अन्ना’ ओ ‘केजरीवाल’ भी
जब करप्सन मुल्क में नज्र-ए सियासत हो गयी
मैं न जा पाया किसी मंदिर में मस्जिद में ‘कँवल’
माँ के चरणों में मेरी पूजा इबादत हो गयी
सृजन : 17 अप्रैल 2013
आकाशवाणी,पटना से 14 जुलाई 2014 को प्रसारित