#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'121
जामो-सुबू1 यूं ही नहीं ठुकराये हुये हैं
उन मस्त निगाहों के पयाम2 आये हुए हैं
लब लाल बदख़्शां3 हैं तो आंखे हैं गिज़ाली4
यौवन के कलश नाज़ से छलकाये हुये हैं
संदल5 सा बदन सुब्ह की किरने है बिखेरे
जुल्फ़ों में शबे-मस्त6 को उलझाये हुये हैं
यादों ने तेरी मुझको दिया इज़्ने-तबस्सुम7
जज्बात8 मेरी आंखो को छलकाये हुये हैं
हम अपनी तबाही का गिला कर नहीं सकते
अंदेशों की बारात से घबड़ाये हुये हैं
अब आस है तेरी, न तेरा ग़म न तमन्ना
दो फूल हैं नरगिस 9 के जो कुम्हलाये हुये हैं
मायूस नहीं तेरे करम से ये गुनहगार
दामन तेरे आगे ही तो फैलाये हुये हैं
मै सुब्ह का सूरज हूं मेरा फ़र्दा10 है रौशन
ये अब्रे-सियह 11 मुझ पे अबस 11 छाये हुये हैं
आशिक हूं 'कंवल’ आम है चर्चा मेरा जग में
क्यों देख के आइना वो शरमाये हुये हैं