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जोबन के दरीचो पे कोई परदा नहीं था

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'132
जोबन के दरीचो पे कोई परदा नहीं था
उस शोख़ को जिस्मों की नुमाइश1 पे यक़ीं था
वो आरिज़ो लब2, वो घनी जु़ल्फ़ें, खुले बाजू खु़शबू का समुन्दर मेरी सांसों के करीं3 था।
आहट, कोई दस्तक, वो सिमटना, वो बिछड़ना कुछ इसके सिवा और निगाहों में नहीं था
ख़ुशियों के दरो-बाम4 थे माज़ी5 के खंडर में इमरोज़6 की बस्ती में ग़़म आलूदा7 मकीं था
कि़स्तों में निगलता रहा किरनों का बवंडर
यादों का सफ़र बर्फ़ की बाहों में कहीं था
वो नाज़, वो अंदाज़, वो ग़म्‍जे8 वो इशारे
ईमान की दौलत पे कहां मुझको यक़ीं था
दावत थी 'कँवल’ उसकी हर एक इक शोख़ अदा में पैकर 9 नहीं वह इश्‍क़ का तशहीरे-हसीं10 था