#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'130
जो पल गुज़र गए उन्हें मुड़कर न देखिये
सब कुछ है आज,माज़ी के मंज़र न देखिये
बाहर के वाक्यात को अन्दर न देखिये
और क़ल्बी वारदात को बाहर न देखिये
रखिये बहू को जैसे हो बेटी, दुलारिये
लाई है अपने साथ क्या ज़ेवर न देखिये
अक्सर चटख़ भी जाता है आईना-ए-जमाल
हर लम्हा अपने हुस्न का तेवर न देखिये
गलियों के शाहराहों के मंज़र तबाह हैं
अपने ही घर सकून है,बाहर न देखिये
पहचान अपनी रखिये हिफ़ाज़त से इन दिनों
रहज़न हैं चार सिम्त पलट कर न देखिये
दरिया था शीरीं ख़्वाबों का आँखों में मौजज़न
कैसा उमड़ पड़ा है समुन्दर न देखिये
शोहरत है ओस जैसी न इतराइये बहुत
बिछने लगी है धूप की चादर न देखिये
अहसास के गुलाब भी कुम्हला गए ‘कँवल’
बर्क़-ओ-वफ़ा हफ़ीज़ से शायर न देखिये
सृजन : 6 अप्रैल 2018
दूरदर्शन के 23 अप्रैल 2018 के आईना में प्रसारित
क़ौमी तंज़ीम,पटना 12 दिसम्बर 2018 पृष्ठ 10 पर प्रकाशित
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