#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'129
जो अब तक न पाया वो सब चाहिए
मुझे ज़िन्दगी का सबब चाहिए
ये मत पूछिए हम से कब चाहिए
करम आपका रोज़-ओ-शब चाहिए
बहारों का मौसम बुलाने लगा
मुझे आपका साथ अब चाहिए
वफ़ा से हों रोशन दिए आँख के
तबस्सुम सजा सुर्ख़ लब चाहिए
हुनर नेकियाँ भूल जाने का हो
बदी याद रखने का ढब चाहिए
तरन्नुम,सलीक़ा,फ़न-ओ-फ़िक्र भी
ग़ज़ल में सुख़न बाअदब चाहिए
रहूँ साथ तेरे घड़ी दो घड़ी
ग़ज़ब है तमन्ना, अज़ब चाहिए
बदन में तमाज़त तेरे जिस्म की
मेरे होंटों पर तेरे लब चाहिए
नहीं दूर तक कोई इन्सां ‘कँवल’
मेरी आरज़ू है कि रब चाहिए
प्रकाशित : संदल सुगंध भाग 4 (2017),पृष्ठ 34