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जब समुन्दर में सूरज कहीं सो गया

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'113
जब समुन्दर में सूरज कहीं सो गया
पंछी वापस हुये हर मकीं सो गया
अब्र आलूदा1 मंज़र हवा ले उड़ी
ख़ुश्क खेतों में ख्वाबे-हसीं सो गया
आंख मलता हुआ वहमे-दिलकश2 उठा बिस्तरे-शब3 पे जिस्मे -यक़ीं4 सो गया
जाने क्या बात थी रात ठहरी नहीं
सुबह जागी, सकूते-ज़मीं5 सो गया
अजनबीयत की दीवार रौशन रही
वह कहीं सो गया, मैं कहीं सो गया
उसकी आंखों ने ताईदे-इक़रार6 की
थरथराते लबों पर 'नहीं' सो गया.
ऐसी खुशबू उड़ी दो बदन से 'कँवल’
चांद महवे-ख़याले-हसीं7 सो गया