#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'099
मसअला कोई सरल हो ये कहाँ मुमकिन है
घर ग़रीबों का महल हो ये कहाँ मुमकिन है
शोख़ अदाओं का न छल हो ये कहाँ मुमकिन है
उनके माथे पे न बल हो ये कहाँ मुमकिन है
मुख्तलिफ़ राय के अफ़राद1 इकट्ठे न हों जब
खिलना लाज़िम न कँवल हो ये कहाँ मुमकिन है
अब हुकूमत है नयी, तोहफ़ा में गीता लीजे
गिफ़्ट अब ताजमहल हो ये कहाँ मुमकिन है
एक से एक मिले मुल्क को रहबर अब तक
राहबर कोई ‘अटल’ हो ये कहाँ मुमकिन है
अब कहाँ कहते हैं इस दौर के उस्तादे-ग़ज़ल
मीर-सी कोई ग़ज़ल हो ये कहाँ मुमकिन है
पेड़ - पौधे ,न कोई छाँव, न बारिश,न घटा
रास्ते में कहीं नल हो ये कहाँ मुमकिन है
कर्म कीजे कि यही आपके वश में है ‘कँवल'
आपके हाथ में फल हो ये कहाँ मुमकिन है
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सृजन : 19 मई 2019