#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'100
घरों में और बाहर देखते हैं
मसायल के समंदर देखते हैं
गुलाबों से मुअत्तर देखते हैं
हसीं रुख़ पर दिसंबर देखते हैं
मचल जाते हैं जिन बातों पे बच्चे
मचल कर हम भी उन पर देखते हैं
अज़ाँ होने लगी है मस्जिदों में
नमाज़ी दिल मुनव्वर देखते हैं
सजाई हमने है बज़्म-ए-हुनर अब
हुनर दिन रात मेम्बर देखते हैं
घरों की बदगुमानी साथ आई
परेशां सारा दफ़्तर देखते हैं
बहुत आसां है बहुओं की हिफ़ाज़त
इन्हें बेटी बनाकर देखते हैं
बुढ़ापा हमसफ़र जब से हुआ है
परेशां घर को अक्सर देखते हैं
सुनो अब जाम में हम फँस गए हैं
चलो बस से उतर कर देखते हैं
मुसलसल जीना मुश्किल हो रहा है
तो अब क़िस्तों में मरकर देखते हैं
‘कँवल’ प्यारी है ये उर्दू ज़ुबां भी
ग़ज़ल इस में भी कह कर देखते हैं
सृजन : 27 फ़रवरी 2014
प्रसारण : आकाशवाणी,पटना 6 मार्च 2014