#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'097
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
घटाकर वो क़ीमत बताता रहा
मेरा ज़र्फ़, मैं मुस्कुराता रहा
उभरता रहा, मैं डुबाता रहा
निगाहों में वह आता जाता रहा
मेरा हौसला उसको भाता रहा
मैं हैरतज़दा गुनगुनाता रहा
मेरी रूह की रंजिशें जानकर
मेरे जिस्म को वो मनाता रहा
खिलौनों पे बच्चे मचलते रहे
पिता भी विवशता छुपाता रहा
मेरा हमसफ़र ज़िद की बस्ती में था
उसे बेसबब मैं घुमाता रहा
सिखाता रहा रूठना मैं 'कँवल'
बिना मा'नी मतलब मनाता रहा