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ग़म तेरा मुझे अपनों का अहसास दिलाये

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'089
ग़म तेरा मुझे अपनों का अहसास दिलाये
मै आज भी तुझ से हूं बहुत आस लगाये
जब बात चली मेरे हसीं जुर्मे-वफ़ा की
इक कातिले-मासूम1 था सर अपना झुकाये
सुनकर किसी बरबादे-मुहब्बत की कहानी सब हंस पड़े लेकिन मेरे आंसू निकल आये
आवाज़ तो दी है तुझे बेसाख्ता लेकिन
गुज़रे हुये लम्हे की तरह तुम नहीं आये
खुर्शीदे-ग़मे-दहर2 की जब तेज हुई धूप
याद आये तेरी चश्मे-करम3 के घने साये
इक जज़्ब-ए- पुर कैफ़े-मुहब्बत की बिना4 पर
इक अजनबी चेहरे को हूं महबूब बनाये
अब आस है तेरी, न तेरा ग़म, न तमन्ना
तू ने भी अजब दिन मेरे महबूब दिखाये
इक साकी-ए-महवश5 है तसव्वुर6 में 'कँवल' के
सावन की महीना है जवां अब्र7 हैं छाये
1. सरल स्वभाव का हत्यारा 2. सांसरिक कष्ट का सूर्य 3. कृपा दृषिट