#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'086
मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन
गगन धरती की मैं हलचल रहा हूँ
युगों से सूर्य बन के जल रहा हूँ
ग़मों के शह्र का वासी हूँ जब से
ख़ुशी के गाँव से ओझल रहा हूँ
अँधेरों के फ़साने से हूँ वाकिफ़
दिया हूँ शाम से ही जल रहा हूँ
लगाया है मुझे नाज़ो-अदा से
किसी की आँख का काजल रहा हूँ
मुझे पहनाया है मेरे पिया ने
वफ़ा के पांव की पायल रहा हूँ
समय हूँ ! हाथ कब आया किसी के
बताने वालों का संबल रहा हूँ
करोना अब नहीं है कह के सब से
‘कँवल’ मैं ख़ुद से ख़ुद को छल रहा हूं