#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल' 067
काविशों1 का काफि़ला2 उनकी नवाजि़श3 पर रूका
काले सायों का सफ़र जिस्मों की ताबिश4 पर रूका
मछलियों की टोलियों पर नाचती थी चांदनी
रक्से-दिलकश5 ये किसी पत्थर की नालिश पर रूका
वस्ल क़ी रानाइयों6 में बामो-दर7 गुम हो गये
तलिख़यों8 का कारवां दारे-नवाजिश9 पर रूका
फ़ेल थी बिजली तिलस्मे-खौफ़10 था हर मोड़ पर
चक्र वहशत का अगरचे कोहे-काविश11 पर रूका
यूं तो उसकी भी तमन्ना थी मुझे मिल जाय पर यार मेरा घर में कल घनघोर बारिश पर रूका
सांझ की दुल्हन ने पीला कर दिया सूरज का मुंह
घूप का लंबा सफ़र दुल्हन की साजि़श पर रूका
बेशिकन था रात भर बिस्तर तसव्वुर12 का कंवल
ज़हन का गीला बदन फूलों की रामिश13 पर रूका
1. प्रयास, परिश्रम 2. मुसाफिरों की टोली 3. मेहरबानी 4. ताप, आंच