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कुर्सियाँ हैं कहाँ फैला अख़बार है

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'071
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
कुर्सियाँ हैं कहाँ फैला अख़बार है
धूप के फ़र्श पर बैठा दिलदार है
भोर का तारा चलने को तैयार है
हर हथेली पे सूरज का उपहार है
चाँदनी रात है, चाँद है झील में
मेरे बिस्तर पे तारों का अंबार है
तख़्त है नाव पर, छेद हैं नाव में
जलमहल में सजा मेरा दरबार है
धूल धरती पे छाए गगन पे घटा
आदमी के लिए उसका घर-बार है
इन दिनों है दुकानों पे मनहूसियत
अब 'अमेज़न' पे मस्ती का बाज़ार है
आज माहौल पर सोचिये कुछ ‘कँवल’
शहर ज़हरीली वादी में लाचार है
सृजन : 24 अक्टूबर, 2020