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क्या कशिश थी तेरे बहाने में

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल' 058
क्या कशिश थी तेरे बहाने में
लुत्फ़ आया फ़रेब खाने में
आतिशे-गम1 न मिल सकी वरना
क्या था खूने-जिगर 2 जलाने में
जुस्तजू में तेरी हुआ हूं गुम
ये मिला मुझको दिल लगाने में
चार तिनकों का हश्र क्या कहिये
लग गई आग आशियाने में
तेरे ग़म का भी बोझ ढो लेता
हाय मजबूर हूं ज़माने में
वो पशेमां से हो गये सुनकर
बात क्या थी मेरे फ़साने में
तुम 'कँवल' को सता लो जी भर के
ये तो यकता3 है ग़म उठाने में