#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'068
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
किनारे खड़ा था भला आदमी
नदी में रहा डूबता आदमी
सदा दूसरों पर फ़िदा आदमी
रहा हीनता से घिरा आदमी
निखार उसमें आया ख़ुशी में कहाँ
ग़मों में बिखरता रहा आदमी
सियासत की बस्ती में गुमसुम रहा
क़यादत पे उतरा नया आदमी
इनायात ग़ैरों पे करता रहा
मुसलसल सगों को ठगा आदमी
ज़माने की मीज़ान पर जाने क्यों
रहा ग़ैरों को तौलता आदमी
ख़ुशी के अलम को उठाए हुए
मिला सोग में ग़मज़दा आदमी
पिचहत्तर बरस हो गए ऐ वतन
नया देश अपना नया आदमी
'कँवल' देश रफ़्तार में खो गया