#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'078
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
कौन चाहेगा तुम्हें आफ़ात में सूर्य भी दिखता नहीं बरसात में
क्या रखा है माज़ी के लमहात में
सोचिये फ़र्दा के सद सफ़हात में
मौत पर तो थे मनाते जश्न तुमडर रहे क्यों मौत के सदमात में
एक अदना वायरस का शुक्रिया
मौत का है ज़ायक़ा ख़ैरात में
मुल्क में ग़द्दार चांदी काटते
तीर भाला ले के हैं सब घात में
अक़्ल ने जब कोई सुध मेरी न ली
मुड़ गया तेरी तरफ़ जज़्बात में
आस्तीं में साँप मत पालो 'कँवल'
नेवलों को दो इन्हें सौग़ात में