#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'077
कौन कहता है ये झमेला है
ज़िन्दगी ख़ुशबुओं का मेला है
सब ख़रीदार फूल ख़ुशबू के
ख़ार बाज़ार में अकेला है
ग़ैर के दिल में जो उतरता रहा
उसको भी मेरे दिल ने झेला है
एक स्कूल में मेरा बच्चा
पुस्तकों का लगाये ठेला है
अब सियासत में ढल रही है ज़ुबां
नीम पर चढ़ रहा करेला है
डायबेटिज़ से दूर रहने को
बाग़ में नारी नर का रेला है
एक अडवाणी एक मोदी हैं
इक गुरु है तो एक चेला है
पेश करता है फल उन्हें भी ‘कँवल’
जिनके हाथों में सख़्त ढेला है
सृजन ; 30 अप्रैल,2014