#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल' 064
कहीं वहशतनुमां अंगड़ाइयां हैं
कहीं ख़य्याम की चौपाइयां हैं
किसी के हौसले,हिम्मत के पीछे
किसी के हुस्न की रानाइयां हैं
मुहब्बत में बुलंदी पर्वतों की
समुन्दर की तरह गहराइयां हैं
तुम्हारे साथ हैं ख़ुशनाम बस्ती
हमारी साँसों में रुस्वाइयां हैं
मेरे होंटों पे हैं ग़मगीन दोहे
तुम्हारे चार सू शहनाइयां हैं
तुम्हारे साथ है महफ़िल की रौनक़
हमारे साथ बस तनहाइयां हैं
सियासत की तवायफ़ झूमती है
फ़िज़ा में रिश्वती पुरवाइयां हैं
सदी की नेकनामी,ख़ुशख़याली
गुज़श्ता लम्हों की परछाइयां हैं
कमल खिलने की चाहत है सभी को
‘कँवल’ इस झील में पर काइयां हैं
सृजन : 13 अक्टूबर,2015
नवरात्रि कलश स्थापन
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