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कहीं ऐसा न हो कि ज़िन्दगी साग़र में ढल जाए

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल' 063
कहीं ऐसा न हो कि ज़िन्दगी साग़र में ढल जाए
तुम्हारी याद खो कर ये हवस की सिम्त चल जाए
कहीं न इंतज़ार-ए-यार बन जाये मेरा क़ातिल
कहीं न दीदा-ए-महजूर से ये दम निकल जाए
हमारी बज़्म-ए-हस्ती में नहीं कोई भी रंगीनी
मुनासिब है यही साक़ी कि दौर-ए-जाम चल जाए
जहाँ वाले मुझे मेरा मक़ाम-ए-ज़िन्दगी दे दें
कहीं रस्म-ए-शराफ़त को न बेकस दिल कुचल जाए
उन्हें मैं ढूंडता रहता हूँ ऐसा सोच कर दिल में
कि उनके मिलने से शायद मेरी क़िस्मत बदल जाए
अभी तक ऐ चमन वालो! ‘कँवल’ भूला नहीं उनको
नहीं मुमकिन मय-ए-रंगीं से उसका दिल बहल जाए
सृजन : 21 दिसंबर,1971
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