#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल' 056
क़ह्क़हों के दिए जलाओ न
एक सुन्दर ग़ज़ल सुनाओ न
हठ के कपड़ों से मत ढ़को काया
मैं निकट आया,तुम भी आओ न
तन सुगन्धित से मन बहकता है
मन न बहके वो कर दिखाओ न
तथ्य सारे भुला के बैठ गए
राजनीति है, मुस्कुराओ न
तुम से मिलकर ही चैन मिलता है
दूसरे लोगों से मिलाओ न
मन को विचलित जो कर दे मित्र मेरे
वैसी आहट को भूल जाओ न
मन तो घर पर है रास्ते में चरण
दृष्टि को लक्ष्य पर लगाओ न
और बांटो हमारे कुनबे को
अपने कुनबे के गीत गाओ न
व्यर्थ निष्प्राण है मुदित रहना
तुम ‘कँवल’ जाओ,जाओ,जाओ न
सृजन : 18 अक्टूबर,2015
दूरदर्शन पटना के आईना कार्यक्रम में 28 अक्टूबर 2015 को प्रसारित
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