#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'053
बहरे-कामिल मुसम्मन सालिम
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
11 212 11 212 11 212 11 212
उसे शुह्रतों की हवा लगी, तभी चार दिन में बहक गया
ज़रा छप गया जो इधर उधर, सरे-आम राह भटक गया
सरे-शाम आया अँधेरे में , मेरे बाजुओं में दमक गया
किसी भीनी भीनी सुगंध से , मेरे मस्त दिल में महक गया
किया साँसें ख़ुशबू से तर ब तर, ढली रात पल में सरक गया
गो अँधेरी रात में आया था, मेरी चौखटों पे चमक गया
उसे सच की खुरदरी चादरों, में सुकून-चैन मिला नहीं
तभी झूठ से सजे मखमली, किसी पैरहन में अटक गया
न थकेगा, कहता था जो कभी, मेरा साथ जम के निभाएगा
’अभी दो क़दम भी चला न था मेरे साथ साथ कि थक गया’
किसे इस चुनाव के दौर में, मिले शोरो- ग़ुल से निजात जब
गली कूचों में किसी सिम्त से, जो जुलूस कोई टपक गया
न पयाम ,ख़त न ही अर्ज़ियाँ, न तो फ़ोटो भेज मेरे लिए
मेरा फेसबुक से है दिल भरा कि मैं व्हाटसप से भी थक गया
वो उसूल पर न खरा रहा, वो क़ुबूल भूल न कर सका
मेरे होंठ हॅंसते रहें सदा, इसी चाह में वो छलक गया
कभी डीपी ज़ूम करे है वो कभी फ़ोटो चूमे, हॅंसे कभी
ये ‘कँवल’ पे तारी है कौन जो, उसे ले के सू -ए-फ़लक गया
महा शिवरात्रि