#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'051
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन
उसके तन में बसी हुई ख़ुशबू
मेरे कमरे में आ गयी ख़ुशबू
बेला चंपा की रजनीगन्धा की
यार की ज़ुल्फ़ों में सनी ख़ुशबू
आशकारा गुलाब कर बैठा
छुपके आई थी यार की ख़ुशबू
ग़ैरों अपनों में फ़र्क़ कर न सकी
सिलसिला प्यार का बनी ख़ुशबू
हिज्र की रातों में सुबकती है
वस्ल के नौबहार की ख़ुशबू
फ़िक्र काँटों का उसको था कितना
फूल से जब जुदा हुई ख़ुशबू
याद आता है घर की ढोलक पर
माँ के हाथों की थाप की ख़ुशबू
रंग टेसू के याद आते हैं
याद आती है फाग सी ख़ुशबू
जाम का था नशा 'कँवल' जिस दम