#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'047
उमीदों की बस्ती सजी, तुम न आये
निगाहें रहीं ढूढ़ती तुम न आये
लिये साग़रो-मीना बैठे रहे हम घटाओं में थी बरहमी1 तुम न आये
जवां हुस्न वालों के मेले लगे थे
तुम्हारी ही थी बस कमी, तुम न आये
जुदा कर न पाती कभी हमको दुनिया
मगर हां तुम्हारी खुशी, तुम न आये
तुम आओगे इक दिन लिये साजे-इश्रत2
ये मौहूम3 उम्मीद थी, तुम न आये
हर इक गाम4 पर हंस रहे थे उजाले
मेरे दिल में थी तीरगी 5 तुम न आये
वफा से 'कँवल’ इक ज़माना था बरहम6
मगर आह क्या बात थी तुम न आये