#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल' 039
इक हवेली में बैचैन थे बामो- दर 1
ख़्वाब की बस्तियों में थी इक रहगुज़र
बालकों की परेशानी पर ग़ौर कर
जल समाधि लगा बैठे बालू के घर .
इक सुनहरी किरन का सफ़र तय हुआ
खुल गईं खिड़कियां, जाग उठा सारा घर .
अब तो तफ़रीहे2 -साहिल 3 भी है रायगां 4
रेत पर बस गये पत्थरों के नगर
टेप यादों का रूक रूक के बजता रहा
रात टेलीविज़न पर थे दो हमसफ़र .
पांव ज्वालामुखी पर दहकते रहे
सर पे मेरे सुलगती रही दोपहर .
देखकर मेरे जहदो5- अमल6 का दिया
मुझको आवाज़ देने लगा इक खंडर
दौरे-हाज़िर7 के इक़बालो-ग़ालिब थे सब
पर कई जानते थे न शेरी हुनर
मैं वही, फिर वही बर्फ़बारी 'कँवल'
खिड़कियों पर मिली फिर वो बेकल नज़र। 1. छत-दरवाज़ा 2. मनोरंजन 3. समुद्र तट