#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'022
आँच के पास आ गया कोयलाअपनी हस्ती मिटा गया कोयलाकाली रंगत से था उदास बहुतफिर अंगीठी को भा गया कोयलाएक बर्तन में जल के होने सेअग्नि करतब दिखा गया कोयला
लाल अंगार बन गया पल में आग में जब चला गया कोयला
भडको जितना भी, बुझना है निश्चितसत्य जग का बता गया कोयला
सदियों धरती में था दबा कुचला हीरा हो कर लुभा गया कोयला
अपने ग़म की कहानियाँ कहकरदिल 'कॅंवल' का दुखा गया कोयला