#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल' 037
आस्मां से छिन गया जब चांद तारों का लिबास
शबनमी कपड़ों में लिपटी थी ज़मीं की नर्म घास
धुंद के पर्वत पिघलते देखकर खुश थीं बहुत
दोपहर को ताज़ा कलियां भी हुईं पर महवे-यास
तोड़कर दीवार लम्हों की हुआ जब रू-ब-रू
मैं भी अफ़्सुर्दा था, उसका दिल भी था बेहद उदास
मौजज़न इमरोज़ का खारा समुंदर था बहुत
तेरी यादों के जज़ीरे थे मगर कुछ आस-पास
जब बदन कलियों का सूरज की किरण छूने लगी
ओस की बूंदों ने पाया ख़ुद को बेहद बदहवास
मेरे तन में ख़ेमाज़न थी इक सुलगती दोपहर
वो भी था पहने हुये बर्फ़ीले मौसम का लिबास
जिस्म की चादर लपेटे था 'कँवल’ वह गुलबदन
मै भी उससे रेज़ा रेज़ा हो रहा था रूशनास
प्रकाशित : शबखून फ़रवरी 1982
(80)