#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'031
आपके हुस्न की लताफ़त हूंलग़्जिशे इश्क़ की इनायत हूं
आबे-दरिया पे इक लकीर नहीं
पत्थरों पर लिखी इबारत हूं
फ़ैसला करता हूँ गवाह बिना
दौरे-हाज़िर की मैं अदालत हूँ
मुझको अन्दर से तुम पुकारो तो
मैं हूँ बाहर तुम्हारी चाहत हूँ
मुझको धारे नदी के मिल न सकेझील के पत्थरों की क़िस्मत हूं
मुझको प्रेम और दया फ़िज़ूल लगे
दौरे-नौ की मैं इक तिजारत हूँ
चाँद को थाल में उतारूं 'कँवल'
एक बच्चे की ज़िद हूँ ! जुरअत हूँ