#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'027
आज भी मेरा दामन खाली, आज भी दिल वीरान वक्त सजाये आज भी बैठा है रंगीन दुकान
फ़ौजी बूटों से घायल गांव की पगडंडी पर एक कुंवारी ढूंढ रही है दो पैरों के निशान
जाम के बदले मयखाने में चलती हैं तलवारें
साक़ी दूर खड़ा है गुमसुम और खुदा हैरान
कैसा है ये दौरे-तरक़्क़ी क्या इसकी सौग़ात
हथियारों की कीमत उची सस्ता है इन्सान
जाने किसकी आस में खोये हैं गोरी के नैन
गली खामोश, उदास मुंडेरे आंगन है सुनसान
सारी खुदाई प्रीत की दुश्मन है मेरे महबूब
रूठ गये जो तुम भी मुझसे रह न सकेंगे प्राण
आवारों सा भटक रहा हूं मैं गलियों में आज 'कँवल’ अहले-नज़र1 महवे-हैरत2 है कौन है ये इन्सान