#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’017
आओ तुम आकर बसा दो मेरे ख़्वाबों के खंडर क्या पता कब ख़्त्म हो जाये ये सांसों का सफ़र
दिल के आंगन मे कभी मौसम मुलाक़ातों का हो तेरे इक स्पर्श से रौशन हों मेरे बामो -दर
मेरे दिल की घाटियों में रू-ब-रू है आजकल तेरे मिलने की खु़शी तुझ से बिछड़ जाने का डर
इक घड़ी भी आंख से ओझल न होने दे कभी
तू कभी मेरे भी दर्शन को तरस जाये अगर .
जब दरख़्तों1 को ज़ुबां मिल जायेगी तब देखना मौसमों के क़हर2 से चीखेंगे ये बर्गो-शजर 3
मेरे मन के द्वीप में वीरानियां जलने लगीं
एक नर हैरान था, इक नारी को पहचान कर
दस्तकें दरवाजा -ए--अहसास पर बैचेन हैं
और लम्हों के घरौंदों में 'कँवल’ है बेख़बर