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अब भी मंजू हसीन लगती है

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’012
ज़ोहरारुख महजबीन लगती है
अब भी तू दिलनशीन लगती है
दिन ब दिन बेहतरीन लगती है
ज़िन्दगी क्या हसीन लगती है
उसकी आँखों की मय मुबारक हो
रक्स में सरज़मीन लगती है
जो सफ़र करते हैं बुलंदी पर
उनको दिलकश ज़मीन लगती है
आस्तीनों में सांप पलते हैं
साफ़ पर आस्तीन लगती है
आसमानों पे जा के देख लिया
ये ज़मीं बेहतरीन लगती है
साल चालिस गुज़र गए हैं ‘कँवल’
अब भी ‘मंजू’ हसीन लगती है
सृजन 10 जून 2013 (11)