#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’011
अब तो मैं रोज़ घर में रहता हूँ
एक मुश्किल सफ़र में रहता हूँ
हाँ ! मुहब्बत ज़ुबान है मेरी
इसलिए मैं ख़बर में रहता हूँ
मेरी निस्बत है ग़ैरों के ग़म से
मैं ख़ुशी के असर में रहता हूँ
दूर रह कर भी पास रहती है
अपनी माँ की नज़र में रहता हूँ
मेरा मतलब ही मेरा मज़हब है
अपने मतलब के घर में रहता हूँ
दूर रहता हूँ मैं सियासत से
इसलिए मोतबर में रहता हूँ
अब शजर पर नहीं परिन्द कोई
साथ बीवी के घर में रहता हूँ
1 मई 2014