#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’002
बहरे-मुतदारिक मक़तूअ महज़ूफ़
फ़ैलुन फ़ैलुन फ़ैलुन फ़ैलुन फ़ैलुन फ़ैलुन फ़ैलुन फ़ा
अन्दर इक तूफ़ान सतह पर ख़ामोशी का पहरा था
आँखों में फ़नकारी, चेहरे पर भोलापन ठहरा था
काँटों की हर एक चुभन मंज़ूर थी शातिर नज़रों को
जब पेड़ों की शाखों पर फूलों का रंग सुनहरा था
सूरज पर इल्ज़ाम था धूप उजाला बांटते रहने का
तारीकी ने उसे डुबोया जहाँ समंदर गहरा था
डूबने वाले के हाथों में हाथ अपना पकड़ाना मत
अपनी हिफ़ाज़त का नुस्ख़ा बचपन का एक ककहरा था
पहली बार मिले थे जब वे, रूप ‘कँवल’ था
मनमोहक लब,गेसू थे मस्त, अदाएं दिलकश, बदन छरहरा था
सृजन - 19 अक्टूबर,2020