#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’004
अगरचे मुझको समर्पित किसी का यौवन था
मैं बेवफ़ा था, कहीं और मेरा तन मन था
न छत थी और न दीवारो-दर, न आंगन था
अभाव के घने जंगल में मेरा बचपन था
उभरते टूटते रिश्तों का खोखलापन था
शजर शजर पे इन्ही लज़्ज़तों का गुलशन था
झिझकती झेंपती गज गामिनी नदी थी उधर
इधर उमंड़ते समुन्दर का बावलापन था
वो ख़्वाबगाह की ग़ज़लें सुना रही थी मुझे
अदा-ए-ख़ास से उसका खनकता कंगन था।
वरक़ वरक़ पे मुनव्वर थीं लब की तहरीरें
किताबे-जिस्म का हर बाब मुझसे रौशन था
नदी ने रेत बनाया था काट कर जिनको
उन्हीं चटानों का फिर डेल्टा पे बंधन था
मैं ख़ुशलिबास मनाज़िर सजा के लाता रहा
मेरी ग़ज़ल का अलग लहजा था अलग फ़न था
न पूछ बेबसी उसके कुंवारेपन की ‘कंवल’
हवस के नाग लपेटे बदन का चंदन था
ग़ज़ल इंटरनेशनल 2007 पृष्ठ 88
शब्द कारख़ाना अप्रैल-जून 2010
सुखनवर मार्च-अप्रैल 2012